﻿WEBVTT LA205

00:01:08.120 --> 00:01:14.380
... रास्ता मिलता नहीं है,
तो ज्ञानी धर्मात्मा-अनुभवी कोई मिल जावे,

00:01:14.404 --> 00:01:17.957
मुमुक्षु: वो आता है न साहब -
Where there is a will there is a way.
पू. लालचंदभाई: हाँ, बस!

00:01:17.981 --> 00:01:20.096
मुमुक्षु: जहाँ चाह है वहाँ राह है।
पू. लालचंदभाई: क्या?

00:01:20.120 --> 00:01:23.256
मुमुक्षु: जहाँ भावना होती है
वहाँ मार्ग मिल जाता है।
पू. लालचंदभाई: मार्ग मिलता है।

00:01:23.280 --> 00:01:33.371
English (अंग्रेजी) में, बराबर! ठीक है!
रुचि चाहिए, रुचिवाले को मार्ग मिलता है।

00:01:33.395 --> 00:01:38.976
मुमुक्षु: हमारा सौभाग्य था
आपके दर्शन होने थे।

00:01:39.000 --> 00:01:43.688
पू. लालचंदभाई: भैया! हमारे दर्शन से
कुछ आपका काम बननेवाला नहीं है।
मुमुक्षु: न बने,

00:01:43.712 --> 00:01:46.361
वो बात दूसरी!
कम से कम ज्ञान में वृद्धि तो होगी।

00:01:46.385 --> 00:01:54.097
पू. लालचंदभाई: मगर हम जो कहते हैं,
वो मुनि-महाराज कहते हैं;
क्या कहते हैं वो हम कहते हैं।

00:01:54.121 --> 00:02:06.410
तो उसे लक्ष में लो, तो काम
हो जायेगा आपका, बस। ये कुंदकुंदाचार्य
भगवान हैं, समर्थ आचार्य हो गये।

00:02:06.434 --> 00:02:16.340
श्री समयसार परमागम शास्त्र है।
इसके कर्ता-कर्म अधिकार की
last (आख़िर) की गाथा।

00:02:16.364 --> 00:02:23.217
ये closing (उपसंहार) होता है कर्ता-कर्म
अधिकार का, १४४ वीं गाथा है। १४४।

00:02:23.241 --> 00:02:28.751
तो government (सरकार) की भी १४४
कलम लागू पड़ती है तो shoot at sight
(दिखने पर मार देना) हो जाता है न?

00:02:28.775 --> 00:02:36.660
ऐसा कर्ता-कर्म अधिकार की
last की गाथा है, आख़िर की।

00:02:36.684 --> 00:02:46.468
कर्ता-कर्म अधिकार में क्या भूल हो
गई कि आत्मा- मैं कर्ता हूँ और पुण्य
और पाप के जो परिणाम होते हैं,

00:02:46.492 --> 00:02:57.212
वो मेरा कार्य, मेरा कर्तव्य,
मैं करनेवाला कर्ता और ये पुण्य-पाप
का परिणाम मेरा कार्य, मेरा कर्म है

00:02:57.236 --> 00:03:04.468
- ऐसी अनादिकाल से जीव की
विपरीत मान्यता चलती आ रही है।

00:03:04.492 --> 00:03:13.765
सचमुच, आत्मा कर्ता और
आत्मा का ज्ञान कर्म जब बनते हैं,
तब भव का अंत आता है।

00:03:13.789 --> 00:03:27.725
मोक्ष का मार्ग, आत्मा का ज्ञान और
आत्मा का श्रद्धान और आत्मा का आचरण
- वो निश्चय मोक्षमार्ग है, सच्चा मोक्षमार्ग!

00:03:27.749 --> 00:03:33.829
और मैं कर्ता और ये पुण्य-पाप मेरा
परिणाम, मेरा कर्म, सब मैं करनेवाला हूँ;

00:03:33.853 --> 00:03:39.643
आत्मा जाननेवाला होने पर भी,
ज्ञाता-दृष्टा होने पर भी;

00:03:39.667 --> 00:03:49.194
अपने आप अनादिकाल से
दूसरे के उपदेश बिना कि
मैं कर्ता हूँ ऐसा अगृहीत मिथ्यात्व,

00:03:49.218 --> 00:03:57.213
अनादिकाल से,
निगोद से संस्कार आज तक का है।
कुछ करना तो चाहिए।

00:03:57.237 --> 00:04:03.385
क्या करना है तेरे को? आहाहा!
जानना चाहिये कि करना चाहिये?

00:04:03.409 --> 00:04:11.591
और जानने में पर को जानना कि
आत्मा को जानना? इतनी सी
छोटी बात है, लंबी तो बात है ही नहीं।

00:04:11.615 --> 00:04:17.980
समझ से काम होता है।
ज्ञान-कला से ज्ञान की प्राप्ति होती है।

00:04:18.004 --> 00:04:21.285
तो कुदरती आप आज आ गए।

00:04:21.309 --> 00:04:28.932
आप भाग्यशाली हैं कि ये जो गाथा है,
सुबह में थोड़ी चली थी।
फिर से मैं लेता हूँ आपके लिए।

00:04:28.956 --> 00:04:34.423
तो इसमें आचार्य भगवान
को एक प्रश्न किया

00:04:34.447 --> 00:04:41.705
कि 'प्रभु! आप बड़ी-बड़ी बात करते हैं
आत्मा का अनुभव करो,
आत्मा का अनुभव करो।

00:04:41.729 --> 00:04:50.496
और आत्मा का अनुभव करो वो तो ठीक है,
हमको मंजूर है, मगर वो तो
निश्चय की बात आप करते हैं'।

00:04:50.520 --> 00:04:57.757
तो आचार्य भगवान कहते हैं कि
'हाँ! हम निश्चय की बात करते हैं कि
आत्मा का ज्ञान करो, आत्मा का श्रद्धान करो'।

00:04:57.781 --> 00:05:08.334
तो शिष्य ने पूछा कि 'वो निश्चय
तक मैं न पहुँचूँ, वहाँ तक व्यवहार
तो बताओ कुछ, वहाँ पहुँचने के लिए।

00:05:08.358 --> 00:05:16.737
पहुँचने का मेरा भाव आपने कहा
तो मंजूर है मेरे को, कि आत्मा का
ज्ञान-श्रद्धान करना, वो मुझे मंजूर है।

00:05:16.761 --> 00:05:22.407
मगर मैं कमजोर हूँ,
मैं गृहस्थ हूँ। आहाहा!

00:05:22.431 --> 00:05:28.728
मैं दीक्षा तो ले सकता नहीं हूँ।
और दीक्षा लेने के पहले कोई
धर्म की शरुआत होती है?’

00:05:28.752 --> 00:05:33.680
आचार्य भगवान: कि हाँ! गृहस्थ अवस्था
में सम्यग्दर्शन-ज्ञान प्रगट हो जाता है।

00:05:33.704 --> 00:05:38.667
शिष्य: अच्छा!
तो सम्यग्दर्शन-ज्ञान का क्या स्वरूप?
आचार्य भगवान: कि आत्मा का अनुभव करो।

00:05:38.691 --> 00:05:45.038
तो शिष्य ने कहा 'प्रभु! आत्मा का
अनुभव करने से सम्यग्दर्शन-ज्ञान होता है
वो बात तो सही है,

00:05:45.062 --> 00:05:47.615
मगर वो तो निश्चय आपने बताया।

00:05:47.639 --> 00:05:54.074
परंतु निश्चय के पहले जैनदर्शन में
कोई व्यवहार होता है कि नहीं,
निश्चय की प्राप्ति करने के लिये?

00:05:54.098 --> 00:06:02.073
हेतु तो आपने कहा, मंजूर है।
वहाँ मैं पहुँच नहीं सकता हूँ, तो
इसके लिए कोई व्यवहार है कि नहीं?

00:06:02.097 --> 00:06:05.149
जिनागम में सर्वज्ञ भगवान ने
कोई व्यवहार बताया है?’

00:06:05.173 --> 00:06:14.067
 की हाँ। तो आचार्य भगवान कहते हैं कि
'हाँ! तेरा प्रश्न अच्छा है।
तेरी उलझन मैं समझ गया।

00:06:14.091 --> 00:06:20.043
तो मैं तेरे को व्यवहार बताता हूँ प्रथम,
बाद में निश्चय बताऊँगा।

00:06:20.067 --> 00:06:25.967
दो बात बताऊँगा,
व्यवहार और व्यवहार के बाद निश्चय।'

00:06:25.991 --> 00:06:28.708
शिष्य: 'तो व्यवहार क्या है
बताओ कृपया करके।'

00:06:28.732 --> 00:06:32.869
उसकी जिज्ञासा व्यवहार की थी।

00:06:32.893 --> 00:06:38.088
उसको ख्याल में ऐसा था कि
आचार्य भगवान ऐसा बतायेंगे

00:06:38.112 --> 00:06:42.647
कि व्रत करो, तप करो, पूजा करो,
दान करो, शील अंगीकार करो

00:06:42.671 --> 00:06:49.335
यात्रा करो,
ऐसा कुछ बतायेंगे
- ऐसी जिज्ञासा अंदर में पड़ी थी।

00:06:49.359 --> 00:06:52.954
तो निकला दूसरा,
व्यवहार दूसरा निकला।

00:06:52.978 --> 00:06:56.421
वो क्या व्यवहार निकलता है?
ये सुनने जैसी बात है।

00:06:56.445 --> 00:07:01.225
व्यवहार की बात,
सचमुच जिनागम क्या व्यवहार कहता है?

00:07:01.249 --> 00:07:06.447
निश्चय की बात तो सुनी ही नहीं,
अनुभव किया भी नहीं।

00:07:06.471 --> 00:07:13.861
मगर जिनागम में निश्चय की प्राप्ति के
लिए, प्राप्ति तो निश्चय की करनी है।

00:07:13.885 --> 00:07:21.497
चलकर झाँसी जाना है, मगर झाँसी जाने
के पहले कोई स्टेशन आता है कि
सीधा झाँसी उड़कर चला जाऊँ मैं?

00:07:21.521 --> 00:07:29.104
कि नहीं, स्टेशन आता है। सुन!
व्यवहार वो स्टेशन है, उतरना नहीं
है वहाँ, टिकिट तो झाँसी की है। हें?

00:07:29.128 --> 00:07:30.832
मुमुक्षु: बहुत सुंदर!

00:07:30.856 --> 00:07:37.651
पू. लालचंदभाई: तो उसकी, निश्चय की
प्राप्ति के पहले क्या व्यवहार होता है
- कृपा करके मेरे को समझाओ।

00:07:37.675 --> 00:07:46.014
जिज्ञासु जीव ने प्रश्न किया। उसको,
जिज्ञासु जीव को जवाब देते हैं
आचार्य भगवान- सुन!

00:07:46.038 --> 00:07:50.438
गाथा १४४ - ये संस्कृत में है
और संस्कृत का अनुवाद है।

00:07:50.462 --> 00:07:57.913
उस संस्कृत का अनुवाद किया है,
जयचंद पंडित जी हो गए जयपुर में,
उन्होंने अनुवाद किया।

00:07:57.937 --> 00:08:01.898
वो सोनगढ़ का अनुवाद नहीं है,
वो जयपुर का अनुवाद है।

00:08:01.922 --> 00:08:07.348
ढूँढारी भाषा में था, बाद में ढूँढारी
भाषा का अक्षर-अक्षर ये गुजराती।

00:08:07.372 --> 00:08:10.989
हम गुजराती लोगों के लिए
ये अनुवाद किया है।

00:08:11.013 --> 00:08:18.012
तो आचार्य भगवान क्या कहते हैं कि
<b>प्रथम, </b>ये व्यवहार बताते हैं।

00:08:18.036 --> 00:08:23.852
<b>प्रथम, </b>यानि शुरुआत।
प्रथम यानि समझे? शुरुआत कैसे करें?

00:08:23.876 --> 00:08:27.658
धर्म की शुरुआत आप कहते हो
कि निश्चय से होती है।

00:08:27.682 --> 00:08:30.736
अच्छा! निश्चय से होती है
मगर निश्चय तक हम पहुँचे नहीं।

00:08:30.760 --> 00:08:34.483
तो पहले कुछ व्यवहार तो हमको,
व्यवहारी-जन को बताओ।

00:08:34.507 --> 00:08:43.926
तो व्यवहारी-जन को व्यवहार
बताते हैं कि <b>प्रथम, </b>
यानि शुद्धात्मा का अनुभव करने के पहले,

00:08:43.950 --> 00:08:50.302
<b>श्रुतज्ञानके अवलम्बनसे </b>
यानि द्रव्यश्रुत के अवलंबन के द्वारा,

00:08:50.326 --> 00:09:00.743
यानि जिनवाणी का अवलंबन लेकर,
आत्मा का अनुभव करने के पहले तू ऐसा कर।

00:09:00.767 --> 00:09:03.288
मुमुक्षु: द्रव्यश्रुत माने
जिनवाणी का अवलंबन?

00:09:03.312 --> 00:09:06.018
पू. लालचंदभाई: जिनवाणी,
द्रव्यश्रुत यानि जिनवाणी।

00:09:06.042 --> 00:09:11.967
जिनवाणी यानि आत्मानुभवी पुरुष
ने कहा उसका नाम जिनवाणी है।

00:09:11.991 --> 00:09:18.609
मिथ्यादृष्टि का बनाया हुआ
वो चोपड़ा (किताबें) है, शास्त्र नहीं है।
समझे? Novel (उपन्यास) है।

00:09:18.633 --> 00:09:24.691
मगर जिसको आत्मा का अनुभव हो गया है
- कुंदकुंदाचार्य भगवान, अमृतचंद्र आचार्य,

00:09:24.715 --> 00:09:35.511
तो ऐसे जो अनुभव कर लिया है
आत्मा का जिसने, उनकी जो
वाणी है उसका नाम जिनवाणी है।

00:09:35.535 --> 00:09:41.606
जिनेन्द्र भगवान की वाणी!
मूल तो सर्वज्ञ भगवान के
श्रीमुख से निकली हुई दिव्यध्वनि है,

00:09:41.630 --> 00:09:49.813
तो गणधर भगवान ने झेली और
उत्तरोतर आचार्य भगवान तक
वो वाणी, जिनवाणी आई। आहाहा!

00:09:49.837 --> 00:09:54.213
ऐसे तो हिमालय से निकलती है न गंगा,
ऐसा आता है न? अपनी स्तुति में।

00:09:54.237 --> 00:09:57.472
मुमुक्षु: <b>वीर हिमाचल तें निकसी,
गुरु गौतम के मुख-कुंड ढरी है</b>
(पं. भूधरदास जी)।

00:09:57.496 --> 00:10:00.550
पू. लालचंदभाई: हाँ! वो जिनवाणी!

00:10:00.574 --> 00:10:11.692
<b>प्रथम, श्रुतज्ञानके </b>द्वारा
यानि द्रव्यश्रुत के द्वारा, इसके
<b> अवलम्बनसे</b> पहले निमित्त बताया।

00:10:11.716 --> 00:10:15.402
कि निमित्त को मानते हो कि नहीं तुम?
ये निमित्त की बात है।

00:10:15.426 --> 00:10:19.054
जिनवाणी निमित्त है, उपादान नहीं है।
उपादान तो इधर (अंदर) है।

00:10:19.078 --> 00:10:27.813
मुमुक्षु: द्रव्यश्रुत निमित्त हुआ?
पू. लालचंदभाई: द्रव्यश्रुत निमित्त है
और आत्मा उपादान है।

00:10:27.837 --> 00:10:33.599
निमित्त है जिनवाणी।
उपादान तक नहीं पहुँचता है
इसके लिए प्रथम क्या करना?

00:10:33.623 --> 00:10:41.230
कि जिनवाणी के द्वारा कहा हुआ
आत्मा का स्वरूप, उसको जानो-पहचानो,
निर्णय करो, ऐसा कहते हैं।

00:10:41.254 --> 00:10:55.374
<b>श्रुतज्ञानके अवलम्बनसे
ज्ञानस्वभाव आत्माका निश्चय करके, </b>
अनुभव के पहले, व्यवहार! आहाहा!

00:10:55.398 --> 00:11:06.520
वो व्यवहार है।
मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ ऐसा
जिनवाणी ने कहा, जिनेन्द्र भगवान ने कहा,

00:11:06.544 --> 00:11:12.181
जिनवाणी ने कहा,
संतों ने कहा कि
तेरा आत्मा ज्ञानस्वभावी है।

00:11:12.205 --> 00:11:16.956
तू रागी-द्वेषी कर्मवाला-बंधवाला
मनुष्य-स्त्री-पुरुष, तू नहीं है।

00:11:16.980 --> 00:11:24.481
वो तो स्वांग है, वो तो सब निकल जाता है।
वो तो निकलनेवाला है, इधर पड़ा रहेगा।

00:11:24.505 --> 00:11:31.096
ये लालचंदभाई का देह है न, कहने में
आता है; लालचंदभाई का तो नहीं है,
पुद्गल का है तो भी कहने में आता है।

00:11:31.120 --> 00:11:36.877
तो उसको तो जला देंगे सब।
आत्मा कहाँ जलता है?
आत्मा तो निकल जायेगा।

00:11:36.901 --> 00:11:45.401
ऐसे आठ कर्म और राग-द्वेष-मोह
की जो परिणति आस्रव है वो
भी स्वांग है, निकल जाता है।

00:11:45.425 --> 00:11:48.536
वो आत्मा का मूल स्वरूप-स्वभाव नहीं है।

00:11:48.560 --> 00:11:57.151
तो प्रथम आत्मा का अनुभव करने
के पहले तो ऐसे निर्णय-निर्धार कर
कि मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ।

00:11:57.175 --> 00:12:05.209
ज्ञानस्वभावी आत्मा होने से
मैं ज्ञाता हूँ, कर्ता नहीं हूँ।
पुण्य-पाप का करनेवाला आत्मा नहीं है।

00:12:05.233 --> 00:12:12.344
जो पुण्य-पाप का करनेवाला
आत्मा मानता है वो अज्ञानी,
अप्रतिबुद्ध, मिथ्यादृष्टि है।

00:12:12.368 --> 00:12:19.040
जिसको मिथ्यादृष्टि रहना हो,
वो माने कि पुण्य-पाप मैं करता हूँ
और मैं भोगता हूँ।

00:12:19.064 --> 00:12:25.676
बाकी जिसको संसार नहीं चाहिए
उसको क्या करना चाहिए?
कि मैं ज्ञान करनेवाला हूँ।

00:12:25.700 --> 00:12:30.985
पुण्य-पाप का करनेवाला मैं नहीं हूँ
क्योंकि आत्मा ज्ञानमयी है।

00:12:31.009 --> 00:12:35.129
इसमें लिखा है <b>ज्ञानस्वभाव आत्माका </b>
निर्णय करो,

00:12:35.153 --> 00:12:43.096
यानि भावकर्म-द्रव्यकर्म-नोकर्म से
मैं रहित हूँ, मैं ज्ञानमयी हूँ,
ऐसा निर्णय करो।

00:12:43.120 --> 00:12:46.541
जैसे <b>'घीका घड़ा'</b>
होने पर भी

00:12:46.565 --> 00:12:52.863
घड़ा तो <b>माटीमय है, घीमय नहीं </b>
(समयसार गाथा ६७) है,
माटीमय है और घीमय नहीं है।

00:12:52.887 --> 00:13:02.161
ऐसे (निज) आत्मा, 'रागी जीव’ ज्ञानमय है
और रागमय नहीं है।

00:13:02.185 --> 00:13:11.500
ऐसे प्रथम, अनुभव के पहले,
धर्म की शुरुआत करने के पहले
ऐसा व्यवहार आ जाता है।

00:13:11.524 --> 00:13:18.585
आ जाता है, आकर टिकता नहीं है।
मुमुक्षु: जाने के लिए आ जाता है।
पू. लालचंदभाई: जाने के लिए आता है।

00:13:18.609 --> 00:13:27.099
जब वो निर्णय कर लिया आत्मा का,
कि मैं ज्ञानस्वभावी हूँ, बाद में
process (विधि) अभी बतायेंगे; निश्चय की।

00:13:27.123 --> 00:13:31.867
व्यवहार के बाद निश्चय की process बतायेंगे।
जब निश्चय आता है
तब वो व्यवहार चला जाता है।

00:13:31.891 --> 00:13:35.673
मुमुक्षु: पहले निर्णय?
पू. लालचंदभाई: पहले निर्णय,
बाद में अनुभव।

00:13:35.697 --> 00:13:39.831
यथार्थ निर्णय!
निर्णय भी यथार्थ निर्णय,

00:13:39.855 --> 00:13:47.304
जैसा सर्वज्ञ भगवान ने अपने आत्मा का
स्वरूप देखा-जाना ऐसा निर्णय होना चाहिए।

00:13:47.328 --> 00:13:54.584
ये कुंदकुंद भगवान का,
आचार्य का कथन, शास्त्र,
भव के अंत का कारण है।

00:13:54.608 --> 00:14:01.263
समझे वो पाए,
नहीं समझे वो रह जाता है।

00:14:01.287 --> 00:14:04.393
वो तो लिखकर चले गए,
अभी तो स्वर्ग में हैं,

00:14:04.417 --> 00:14:11.657
स्वर्ग से निकलकर
अरिहंत होकर सिद्ध होंगे,
एकावतरी हैं - एक ही भव है! आहाहा!

00:14:11.681 --> 00:14:18.341
लौकांतिक देव हुए कुंदकुंदाचार्य,
और अभी ब्रह्मचारी हैं वो, लौकांतिक देव।

00:14:18.365 --> 00:14:26.840
वहाँ से निकलकर ध्यान में मग्न होकर
अरिहंत दशा प्रगट होकर सिद्ध हो
जायेंगे - ऐसे पुरुष हो गए। आहाहा!

00:14:26.864 --> 00:14:41.517
२००० वर्ष पहले मद्रास से दूर,
८० मील दूर पोन्नूर-हिल है।
पोन्नूर-हिल है, देखा है? नहीं देखा।

00:14:41.541 --> 00:14:52.324
पोन्नूर-हिल है, मद्रास से ८० मील दूर।
वहाँ से महाविदेहक्षेत्र गए थे, सीधा।

00:14:52.348 --> 00:15:00.995
वहाँ से, महाविदेहक्षेत्र से आकर
उन्होंने ये प्रवचनसार, समयसार, नियमसार,
अष्टपाहुड़ आदि शास्त्र सब लिखे हैं।

00:15:01.019 --> 00:15:08.518
ऐसे समर्थ आचार्य भगवान
अज्ञानी प्राणियों को फरमाते हैं
कि प्रथम क्या करना?

00:15:08.542 --> 00:15:12.414
कि प्रथम 'मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ';

00:15:12.438 --> 00:15:19.843
मेरे आत्मा में, भावकर्म-द्रव्यकर्म-नोकर्म
से रहित हूँ मैं - वो तो तीनों जड़
भाव हैं; मैं तो चैतन्य हूँ।

00:15:19.867 --> 00:15:23.504
मैं ज्ञानमय हूँ और रागमय मैं नहीं हूँ।

00:15:23.528 --> 00:15:34.556
ऐसे ज्ञानस्वभावी आत्मा का निर्णय कर ले,
निश्चय कर ले, निर्धार कर ले। व्यवहार
श्रद्धा की बात चलती है अभी। आहाहा!

00:15:34.580 --> 00:15:43.744
पुण्य करते-करते धर्म होगा,
व्यवहार श्रद्धा नहीं है, वो तो
मिथ्यात्व पोषक भाव है। आहाहा!

00:15:43.768 --> 00:15:53.583
जगत को कठिन लगे।
लगे तो लगो! संतों को क्या?
उनको तो कोई चंदा करना नहीं है।

00:15:53.607 --> 00:15:58.431
संतों को कुछ लेना है अपने पास से,
पैसा-वैसा? नहीं लेना है। आहाहा!

00:15:58.455 --> 00:16:06.616
वो तो जैसा स्वरूप अपने को प्राप्त हुआ
वो, उसको सबको बताते हैं कि
ऐसा तेरा भी स्वरूप है। बस!

00:16:06.640 --> 00:16:11.660
तो प्रथम निर्णय कर, निर्धार कर,
वो व्यवहार श्रद्धा-व्यवहार ज्ञान।

00:16:11.684 --> 00:16:20.263
वो ज्ञान भी व्यवहार और
श्रद्धा भी व्यवहार, निश्चय नहीं;
संवर नहीं है उसमें, धर्म नहीं है;

00:16:20.287 --> 00:16:23.127
निर्णय किया,
अभी धर्म नहीं है।

00:16:23.151 --> 00:16:30.296
वो तो विकल्प है,
वो तो इंद्रियज्ञान में निर्णय हुआ,
आत्मा का अनुभव नहीं है निर्णय में।

00:16:30.320 --> 00:16:35.038
अच्छा! निर्णय करने के बाद
कोई process है? कि हाँ! सुन!

00:16:35.062 --> 00:16:41.277
ध्यान देकर सुन तो सही पहले
कि क्या स्वरूप है? आहाहा!

00:16:41.301 --> 00:16:49.983
तेरी कल्पना अभी छोड़ दे।
तू जो मानता है धर्म की क्रिया,
वो एक बाजू रख और मेरी बात सुन।

00:16:50.007 --> 00:16:56.687
दो बात अपने सामने आती हैं
तो परीक्षा करके,
तेरे को अनुभव करके प्रमाण करना।

00:16:56.711 --> 00:16:58.222
मैं कहता हूँ, बस।

00:16:58.246 --> 00:17:01.935
आचार्य भगवान ने कहा तू
<b>प्रमाण करना</b>
(समयसार गाथा ५)। आहाहा!

00:17:01.959 --> 00:17:05.823
<b>अनुभव</b> से <b>प्रमाण करना</b>।
मेरे कहने से नहीं मानना।

00:17:05.847 --> 00:17:13.718
तो आचार्य भगवान प्रथम निर्णय
की बात बताते हैं - व्यवहार श्रद्धा,
व्यवहार ज्ञान। आहाहा!

00:17:13.742 --> 00:17:23.848
बाद में प्रथम और पश्चात् - एक लाइन में
प्रथम और एक लाइन के आखिर में
पश्चात्। आहाहा! शब्द लिखा।

00:17:23.872 --> 00:17:27.255
मुमुक्षु: निर्णय के पश्चात्।
पू. लालचंदभाई: निर्णय के पश्चात्!

00:17:27.279 --> 00:17:30.754
निर्णय झूठा हो तो?
मुमुक्षु: निर्णय प्रथम।
पू. लालचंदभाई: निर्णय प्रथम!

00:17:30.778 --> 00:17:43.102
और निर्णय विपरीत हो तो?
तो अनुभव नहीं होगा।
निर्णय यथार्थ होना चाहिए। आहाहा!

00:17:43.126 --> 00:17:51.183
<b>प्रथम</b> और पश्चात्।
भाग्यशाली हैं बहन आप,
इस गाथा में आ गए।

00:17:51.207 --> 00:17:58.989
हमारे भाई विष्णुकूमारजी भाग्यशाली हैं।
कि प्रथम क्या करना सारे जगत का प्रश्न है।

00:17:59.013 --> 00:18:04.027
सारे जगत का ये प्रश्न है,
प्रथम क्या करना।

00:18:04.051 --> 00:18:09.749
कोई थोड़ी बात तो बताओ
व्यवहार की प्रथम क्या करना?

00:18:09.773 --> 00:18:14.856
१५-२० साल पहले हमारे
ऊपर एक आफत आई, हमारे ऊपर।

00:18:14.880 --> 00:18:18.376
हम तो बहुत साल से
वाँचन (प्रवचन) करते थे।

00:18:18.400 --> 00:18:25.440
तो राजकोट में हमारे ऊपर आफत आ गई।
निश्चय-प्रधान कथन मेरी शैली।

00:18:25.464 --> 00:18:32.560
तो एक भाई ने कहा, बड़ा भाई,
ऐसा मुमुक्षु में। समझे? प्रतिष्ठित!

00:18:32.584 --> 00:18:37.680
उन्होंने कहा कि लालचंदभाई,
आप की बात निश्चय की तो बराबर लगती है,

00:18:37.704 --> 00:18:44.338
मगर थोड़ा-थोड़ा व्यवहार की बात
आप साथ में करो न, तो हमको ठीक पड़े।

00:18:44.362 --> 00:18:47.186
व्यवहार का पक्षवाला व्यवहार की
माँग करता है। कोई परेशानी नहीं!

00:18:47.210 --> 00:18:50.827
मुमुक्षु: पक्ष वाला।
पू. लालचंदभाई: पक्ष वाला! हाँ!

00:18:50.851 --> 00:18:54.929
तो मैंने कहा कल से
मैं व्यवहार की बात बताऊँगा।

00:18:54.953 --> 00:19:03.763
तो ये बताया कि
'भेदज्ञान करना सो व्यवहार है;
अभेद का अनुभव करना सो निश्चय है'।

00:19:03.787 --> 00:19:11.761
लिख लेना! वो बात भूलना नहीं
- भेदज्ञान करना सो व्यवहार है।

00:19:11.785 --> 00:19:23.541
नीलम भी लिखती है,
वहाँ भी लिखती है,
वो भी लिखती है। लिखो! आहाहा!

00:19:23.565 --> 00:19:29.065
भेदज्ञान करना सो व्यवहार है।
भेदज्ञान दो के बीच में होता है।

00:19:29.089 --> 00:19:37.534
मैं ज्ञानमय हूँ और मैं रागमय नहीं हूँ।
मैं सुखमय हूँ और दुखमय नहीं हूँ। आहाहा!

00:19:37.558 --> 00:19:42.360
मैं अबद्ध हूँ
और कर्म से बंधा हुआ नहीं हूँ।
ऐसे-ऐसे भेदज्ञान!

00:19:42.384 --> 00:19:46.860
भेदज्ञान आप समझ गए?
भेदज्ञान समझ गये न,
दो के बीच में भेदज्ञान होता है।

00:19:46.884 --> 00:19:51.694
आत्मा और अनात्मा,
एक आत्मा और दूसरा भाव अनात्मा।

00:19:51.718 --> 00:20:02.285
अनात्मा मैं नहीं हूँ, मैं तो आत्मा हूँ।
ऐसे भेदज्ञान का विचार करना सो व्यवहार है।

00:20:02.309 --> 00:20:11.961
आप भाग्यशाली हैं कि ये व्यवहार
की बात आपको मिली। आहाहा!

00:20:11.985 --> 00:20:15.598
बाद में
अभेद का अनुभव करना सो निश्चय।

00:20:15.622 --> 00:20:25.727
भेदज्ञान का विचार सो व्यवहार
और अभेद का अनुभव सो निश्चय।

00:20:25.751 --> 00:20:32.034
भेदज्ञान का विचार सो व्यवहार
और अभेद का अनुभव सो निश्चय।

00:20:32.058 --> 00:20:43.531
ये लिखती है। फिर से, फिर से पढ़ना।
लिखकर उनको बहन को बताओ।
बराबर? समझ में आ गया अभी?

00:20:43.555 --> 00:20:46.668
मुमुक्षु: अभेद का अनुभव सो निश्चय
(और) भेदज्ञान का विचार व्यवहार।

00:20:46.692 --> 00:20:51.057
पू. लालचंदभाई: भेदज्ञान का विचार
वो व्यवहार। भेदज्ञान का विचार तो आता है।

00:20:51.081 --> 00:20:52.460
मुमुक्षु: दो वस्तुओं में चलता है मतलब?

00:20:52.484 --> 00:20:57.511
पू. लालचंदभाई: दो वस्तुओं में
भेदज्ञान होता है - ये (अंदर) स्व
और एक (बहिर) पर है। समझे?

00:20:57.535 --> 00:21:02.093
आप चैतन्यमय आत्मा हैं
और देह आपका नहीं है।

00:21:02.117 --> 00:21:11.406
लड़का आपका नहीं है,
ये विष्णुकुमार आपके नहीं हैं
- भेदज्ञान दो के बीच में होता है न।

00:21:11.430 --> 00:21:14.721
मैं ज्ञानमयी हूँ और ज्ञान के
अलावा मेरी कोई चीज (नहीं है)।

00:21:14.745 --> 00:21:22.043
ये मकान जर - जवाहरात, ये गाड़ी, स्त्री,
कोई मकान मेरा नहीं है। आहाहा!

00:21:22.067 --> 00:21:29.026
मैं ज्ञानमयी आत्मा हूँ,
ये कोई चीज मेरी नहीं है। उसके
प्रति उदास रहना चाहिए, अंतर में से।

00:21:29.050 --> 00:21:36.639
अंदर में से उदास!
वो ऐसा आता है कि ये लड़का मेरा,
मगर अंदर में मेरा नहीं है।

00:21:36.663 --> 00:21:38.986
अंदर की बात है,
રમત (खेल) अंदर की।

00:21:39.010 --> 00:21:43.354
भेदज्ञान अंदर चलता है।
रसोई करते-करते भेदज्ञान चलता है।

00:21:43.378 --> 00:21:46.321
ऐसा मंदिर में जाओ
तो भेदज्ञान करना, ऐसा नहीं।

00:21:46.345 --> 00:21:54.292
चलते-फिरते, सोते-उठते-बैठते भी
भेदज्ञान का विचार, सो व्यवहार।
मुमुक्षु: हर समय।

00:21:54.316 --> 00:22:00.342
पू. लालचंदभाई: हर समय। बस!
उसमें एक पैसा का खर्च नहीं है।

00:22:00.366 --> 00:22:05.786
खर्च नहीं है, खर्च समझे न?
पैसा देना कुछ नहीं है। आहाहा!

00:22:05.810 --> 00:22:12.922
जैसा स्वरूप है ऐसा विचार करो कि
मैं ये (स्व) हूँ और ये नहीं हूँ।
बस इतना ही! आहाहा!

00:22:12.946 --> 00:22:21.985
इसका नाम व्यवहार।
शुभभाव करना उसका नाम अज्ञान, लिखो।

00:22:22.009 --> 00:22:30.761
शुभभाव करने का अभिप्राय,
उसका नाम अज्ञान।
मुमुक्षु: करने का अभिप्राय।

00:22:30.785 --> 00:22:34.479
पू. लालचंदभाई: करने का अभिप्राय!
अभी लिखाता हूँ, वो वाक्य बाकी है।

00:22:34.503 --> 00:22:47.053
(शुभभाव) करने का अभिप्राय उसका
नाम अज्ञान और शुभभाव आवे,
उसको जानना उसका नाम व्यवहार।

00:22:47.077 --> 00:22:49.485
क्या कहा?
मुमुक्षु: शुभभाव को जानना
उसका नाम व्यवहार।

00:22:49.509 --> 00:22:58.711
पू. लालचंदभाई: शुभभाव करने
का अभिप्राय उसका नाम अज्ञान है -
ये मंत्र है। ये सब संतों ने कहा है।

00:22:58.735 --> 00:23:00.722
मुमुक्षु: इसमें क्या कर्तापने की
बुद्धि आ जाती है!

00:23:00.746 --> 00:23:05.332
पू. लालचंदभाई: कर्तापने की बुद्धि आ
जाती है बहन, ज्ञाता नहीं रह सकते आप।

00:23:05.356 --> 00:23:11.449
जो जाने सो कर्ता नहीं है
और करे वो जानता नहीं।
आता है, एक श्लोक आता है न।

00:23:11.473 --> 00:23:21.179
<b>करै करम सोई करतारा। जो जानै सौ जाननहारा॥ </b>
<b>जो करता नहि जानै सोई। जानै सो करता नहि होई॥३३॥</b>
(नाटक समयसार – कर्ता कर्म क्रियाद्वार, श्लोक ३३)

00:23:21.203 --> 00:23:25.121
वो ही जो बनारसीदास का है श्लोक।

00:23:25.145 --> 00:23:32.241
जो जानता है वो करता नहीं है
और करता है वो जानता नहीं है।
ज्ञाता नहीं रहता है।

00:23:32.265 --> 00:23:43.031
कर्ताबुद्धि तो पाप है बड़ा।

00:23:43.055 --> 00:23:47.919
ये आपके लिए नहीं आया है।
हमारे क्रम में आया। सुबह में वो चल गया।

00:23:47.943 --> 00:23:51.076
सुबह में वो बात सब व्यवहार की चल गई।

00:23:51.100 --> 00:23:58.547
हम तो निश्चय के आधार में आ गए थे
मगर फिर से आपके लिए लिया। समझे?

00:23:58.571 --> 00:24:05.550
हमारे यहाँ ये क्रम चलता है न
१४२-४३-४४ तो ये १४४ तक
सुबह में आया था।

00:24:05.574 --> 00:24:11.046
पक्षातिक्रांत होने पर आत्मा का अनुभव
होता है - ऐसी सूक्ष्म बात चली बहुत।

00:24:11.070 --> 00:24:15.580
मुमुक्षु: पक्षातिक्रांत का मतलब?
पू. लालचंदभाई: पक्षातिक्रांत का मतलब ये है

00:24:15.604 --> 00:24:22.823
कि आपने निर्णय किया
कि मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ।

00:24:22.847 --> 00:24:30.565
मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ,
आपने जो निर्णय किया, वो पक्ष है;

00:24:30.589 --> 00:24:35.408
उसमें आत्मा का अनुभव नहीं होता है,
वो विकल्प है।

00:24:35.432 --> 00:24:41.298
विकल्प के द्वारा निर्णय किया आपने,
विकल्प के द्वारा, मानसिक ज्ञान के द्वारा।

00:24:41.322 --> 00:24:46.085
ज्ञान से अनुभव नहीं हुआ।
मानसिक ज्ञान के द्वारा,
आपने जिनवाणी के द्वारा....

00:24:46.109 --> 00:24:49.576
मुमुक्षु: माने इंद्रियों के द्वारा।
पू. लालचंदभाई: इंद्रियों के द्वारा
आपने निर्णय किया

00:24:49.600 --> 00:24:57.465
कि मैं ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ।
ऐसा जो विकल्प उठता है
उसका नाम निश्चयनय का पक्ष है।

00:24:57.489 --> 00:25:03.925
व्यवहारनय का पक्ष उसकी तो बात
छोड़ो, वो तो सम्यक् सन्मुख ही नहीं है।

00:25:03.949 --> 00:25:10.025
मगर निश्चय का पक्ष आ गया
आपको कि मैं तो ज्ञानानंद आत्मा हूँ,
ज्ञानस्वभावी आत्मा हूँ

00:25:10.049 --> 00:25:15.974
- ऐसा जो विकल्प उठाया आपने,
इसका नाम निश्चयनय का पक्ष है।

00:25:15.998 --> 00:25:24.424
वो विकल्प छूटता है और अनुभव होता है,
उसका नाम पक्षातिक्रांत है। आहाहा!

00:25:24.448 --> 00:25:27.632
मुमुक्षु: अनुभव के लिए पक्षातिक्रांत।
पू. लालचंदभाई: हाँ! जरूरी है।

00:25:27.656 --> 00:25:37.618
अनुभव करने के लिए पक्षातिक्रांत करना है।
पक्ष में आता है मगर पक्ष में रुकना नहीं;
पक्ष भी छोड़ देना।

00:25:37.642 --> 00:25:40.176
मुमुक्षु: पक्ष रहेगा तो फिर विकल्प है।
पू. लालचंदभाई: हाँ! विकल्प है।

00:25:40.200 --> 00:25:42.934
विकल्प में तो अनुभव नहीं होता है,
वो तो आकुलता है।

00:25:42.958 --> 00:25:46.634
वो आएगा इसमें (गाथा १४४),
आकुलता है। इसमें ही है पाठ।

00:25:46.658 --> 00:25:54.911
सारी १४४वीं गाथा बहुत
A to Z (शुरू से अंत तक) सारा स्वरूप है
- मिथ्यादृष्टि को प्रथम क्या करना,

00:25:54.935 --> 00:25:58.097
बाद में क्या करना,
अनुभव की process बताई।

00:25:58.121 --> 00:26:02.231
बाद में अनुभव क्या हुआ
और अनुभव का फल क्या आया,
सब एक गाथा में है।

00:26:02.255 --> 00:26:06.121
मुमुक्षु: माने अनुभव के सन्मुख है
वो पक्षातिक्रांत है?

00:26:06.145 --> 00:26:10.743
पू. लालचंदभाई: पक्ष में आया,
पक्ष में आया... पक्ष दो प्रकार का है।

00:26:10.767 --> 00:26:17.787
ऊपर-ऊपर का पक्ष आता है
और एक अंदर का निर्णय वाला
का पक्ष आता है, अपूर्व पक्ष!

00:26:17.811 --> 00:26:20.976
अनंतकाल से शुद्धनय का पक्ष आया नहीं है।

00:26:21.000 --> 00:26:28.034
समयसार की ११ वीं गाथा में लिखा है
कि <b>शुद्धनय का पक्ष जीव को
कभी आया नहीं </b>है।

00:26:28.058 --> 00:26:33.079
व्यवहार का पक्ष अनादि का है
और <b>शुद्धनय का पक्ष कभी आया नहीं</b> है।

00:26:33.103 --> 00:26:40.791
उसका अर्थ क्या है कि जैसा
अपना शुद्धात्मा है, ऐसा अपना
ज्ञान-श्रद्धान में यथार्थ निर्णय आ जावे।

00:26:40.815 --> 00:26:48.885
यथार्थ निर्णय के बाद अनुभव होता है,
जो निर्णय में विपरीतता हो
तो अनुभव नहीं आएगा।

00:26:48.909 --> 00:26:54.329
ऊपर-ऊपर का निर्णय अलग बात है
और अंदर का निर्णय आवे वो अलग बात है।

00:26:54.353 --> 00:26:59.048
ऊपर-ऊपर का निर्णय धारणा में जाता है।

00:26:59.072 --> 00:27:03.180
धारणा ज्ञान में तो कोई फायदा नहीं है,
धारी रखा आपने बस।

00:27:03.204 --> 00:27:05.644
शक्कर मीठी है,
शक्कर मीठी है, शक्कर मीठी है।

00:27:05.668 --> 00:27:10.541
स्वाद आता है आपको विष्णुकुमार जी?
नहीं आयेगा।

00:27:10.565 --> 00:27:16.446
शक्कर मीठी है,
मीठी है बोलो आप भाषा,
स्वाद नहीं आता है।

00:27:16.470 --> 00:27:22.782
तो स्वाद करने के लिए क्या करना
चाहिए? खाना पड़ेगा बस! ऐसा।

00:27:22.806 --> 00:27:28.283
शक्कर मीठी है, मीठी है वो
शक्कर का पक्ष है - वो दृष्टांत देता हूँ।

00:27:28.307 --> 00:27:30.727
शक्कर मीठी है, शक्कर मीठी है,
शक्कर मीठी है,

00:27:30.751 --> 00:27:35.942
तो आप सब पदार्थों से छूट गए,
एक शक्कर पर आए। शक्कर खाना है।

00:27:35.966 --> 00:27:38.187
तो खाने के पहले उसका स्वभाव क्या है?

00:27:38.211 --> 00:27:43.517
मीठी है, मीठी है, मधुर है,
स्वादिष्ट है, उसका नाम पक्ष।

00:27:43.541 --> 00:27:50.256
और वो शक्कर का 'मीठी है'
ऐसा विकल्प छोड़कर जीभ पर रखो,

00:27:50.280 --> 00:27:59.200
जब जीभ पर रखता है तब पक्ष छूट
जाता है, शब्द छूट जाता है। जो
शब्द बोलो तो अनुभव नहीं होगा।

00:27:59.224 --> 00:28:03.413
स्वाद लेता है कोई शक्कर का,
तो मैं पूछूँ भैया!

00:28:03.437 --> 00:28:06.565
शक्कर कैसी है विष्णुकुमारजी?
तो आप क्या कहेंगे?

00:28:06.589 --> 00:28:11.555
अभी मत (पूछो)!
अभी तो मेरे को खाने दो।
बाद में मैं बताऊँगा, खाने के बाद।

00:28:11.579 --> 00:28:14.732
अभी तो मेरे को रस
- स्वाद लेने दो शक्कर का।

00:28:14.756 --> 00:28:18.914
शक्कर का स्वाद लेते समय
विकल्प नहीं उठता है -

00:28:18.938 --> 00:28:24.364
पू. लालचंदभाई: ये जानने जैसी बात है,
समझने जैसी बात है। आहाहा!

00:28:24.388 --> 00:28:28.987
ये दिगम्बर संतों की कही हुई बात है,
किसी के घर की बात नहीं है।

00:28:29.011 --> 00:28:36.745
हम तो पहले स्थानकवासी थे। हमने तो
ये जो गुरुदेव - कानजी स्वामी को
अपनाया, वो परीक्षा करके अपनाया।

00:28:36.769 --> 00:28:43.481
वर्णीजी के पास मैं गया था,
गणेशप्रसाद वर्णीजी के पास।
आज से ३५ वर्ष पहले गया था।

00:28:43.505 --> 00:28:47.616
७८ साल की उम्र हुई
शरीर की हुई अभी, ७८।

00:28:47.640 --> 00:28:54.670
३५ साल पहले मैं गया था,
गणेशप्रसाद वर्णीजी उस समय
ईसरी में थे। प्रसिद्ध (व्यक्ति)!

00:28:54.694 --> 00:29:01.590
उनको २० प्रश्न पूछे थे मैंने,
२० प्रश्न, questions पूछे थे।

00:29:01.614 --> 00:29:05.268
क्योंकि मैं (तो) स्थानकवासी था,
अभी धर्म का परिवर्तन करना था।

00:29:05.292 --> 00:29:14.418
तो स्थानकवासी सच्चा कि
दिगम्बर सच्चा? निर्णय तो अपने को
करना चाहिए न! हें? ऐसी बात है।

00:29:14.442 --> 00:29:17.684
सब जगत के लोग चावल लेने जाते हैं।

00:29:17.708 --> 00:29:22.520
तो चावल लेने के लिए दो-चार
दुकान खोज करते हैं (कि) कैसा है,
भाव कैसा है, माल कैसा है।

00:29:22.544 --> 00:29:29.694
धर्म के लिए कोई परीक्षा नहीं करता है।
हाँ जय महाराज! नहीं चले 'जय महाराज'।

00:29:29.718 --> 00:29:34.305
मैं एक दृष्टांत देता हूँ, जरा दृष्टांत
संसारी जीव को लागू पड़े इसलिए।

00:29:34.329 --> 00:29:41.603
वो तो दृष्टांत है,
उस दृष्टांत में कोई माल नहीं है,
ध्यान रखना। दृष्टांत में माल नहीं है।

00:29:41.627 --> 00:29:52.428
एक भाई ने सगाई की। सगपण किया,
मतलब सगाई की। लग्न बाकी है
(और) फिर लग्न भी हो गया। ठीक!

00:29:52.452 --> 00:30:01.363
अभी वो तो पति-पत्नी हो गए।
तो कभी कोई पति ठगा जाता है
और कभी पत्नी भी ठगा जाती है।

00:30:01.387 --> 00:30:07.544
एक जैसा तो मेल, कभी-कभी
पुण्यशाली हो तो एक जैसा मिले,
बाकी तो मिलता नहीं है।

00:30:07.568 --> 00:30:14.787
तो क्या (है कि) एक भव
बिगड़ता है। कितने भव बिगड़ते
हैं? एक ही भव।

00:30:14.811 --> 00:30:20.853
अनुकूल नहीं मिले तो चला लेता है,
निभा लो, निभा लो, निभा लो,
ये पूरी करो जिंदगी।

00:30:20.877 --> 00:30:28.005
विवाह-विच्छेद नहीं करना,
निभा लो! तो एक भव बिगड़ा।
कितने भव बिगड़े? एक भव।

00:30:28.029 --> 00:30:32.549
अच्छा! धर्म की परीक्षा नहीं की
तो अनंत भव बिगड़ जायेंगे।

00:30:32.573 --> 00:30:39.750
हाँ! धर्म के लिए तो बराबर
परीक्षा करनी चाहिए और परीक्षा
करने की शक्ति आपके पास है।

00:30:39.774 --> 00:30:42.843
आप कहते हैं कि मुझे संस्कृत (नहीं
आती)। संस्कृत की जरूरत नहीं है।

00:30:42.867 --> 00:30:47.344
वीतरागभाव से धर्म होता है, राग
से तीन काल में धर्म होता नहीं है।

00:30:47.368 --> 00:30:53.266
कोई राग की क्रिया बतावे तो धर्म नहीं
है, (वो) अधर्म है। सीधी बात है! आहाहा!

00:30:53.290 --> 00:31:01.398
ऐसे परीक्षा हो सकती है। हमने
भी परीक्षा की थी। परीक्षा करके
हमने गुरुदेव को अपनाया। समझे?

00:31:01.422 --> 00:31:06.489
तो इधर आचार्य महाराज...
मुमुक्षु: आपके प्रश्न क्या थे? बीस प्रश्न
जो आपने किये मुनि विद्यानंदी से?

00:31:06.513 --> 00:31:11.547
पू. लालचंदभाई: बीस प्रश्न में ऐसा प्रश्न था...
मुमुक्षु: विद्यानंदी जी से नहीं, वर्णीजी।

00:31:11.571 --> 00:31:18.226
पू. लालचंदभाई: वर्णीजी महाराज!
वर्णीजी महाराज ईसरी में थे, अभी
तो स्वर्गवास हो गया (उनका)।

00:31:18.250 --> 00:31:24.395
वो क्षुल्लक थे, क्षुल्लक थे
और बड़े विद्वान-प्रसिद्ध;

00:31:24.419 --> 00:31:33.421
ये सारे समयसार की
संस्कृत-टीका मुखपाठ (थी), उनको
(शास्त्र) खोलना नहीं पड़े, इतने विद्वान!

00:31:33.445 --> 00:31:45.414
उनको प्रश्न किया था कि
भैया कार्य होता है (तो) उपादान
से होता है कि निमित्त से होता है?

00:31:45.438 --> 00:31:49.018
उन्होंने कहा कि भैया,
एक कार्य में दो कारण होते हैं;

00:31:49.042 --> 00:31:59.098
अकेला उपादान से नहीं होता है,
निमित्त भी चाहिए।

00:31:59.122 --> 00:32:05.124
मिट्टी में से घड़ा होता है न, घड़ा?
मुमुक्षु: माने ऐसा उत्तर (मिला)
कि चाहिए निमित्त।

00:32:05.148 --> 00:32:08.001
महाराज जी का ऐसा उत्तर मिला
कि चाहिए निमित्त।

00:32:08.025 --> 00:32:14.169
पू. लालचंदभाई: निमित्त चाहिए,
उनका वजन वहाँ था।
समझे आप? यथार्थ नहीं था।

00:32:14.193 --> 00:32:18.740
कार्य उपादान से होता है, उस समय
अनुकूल निमित्त (उपस्थित) होता है।

00:32:18.764 --> 00:32:23.310
निमित्त (उपस्थित) होता है मगर निमित्त
से होता है, वो बात ऐसी नहीं है।

00:32:23.334 --> 00:32:26.203
तो तो उपादान पराधीन हो गया,

00:32:26.227 --> 00:32:30.959
हाँ! तो तो एक तीर्थंकर भगवान मिलें अपने
को (तो) सारे जगत को मोक्ष पहुँचा देवें।

00:32:30.983 --> 00:32:37.114
बड़े निमित्त हैं वो तो। आप भी गये थे हो!
तीर्थंकर भगवान की वाणी आपने सुनी है।

00:32:37.138 --> 00:32:41.159
आपको याद नहीं है बाकी सुनी है आपने।
आहाहा! सबने सुनी है।

00:32:41.183 --> 00:32:48.591
मुमुक्षु: हाँ! तो निमित्त-प्रधान बतलाया।
पू. लालचंदभाई: हाँ! (ऐसा) बतलाया हमको
(लेकिन) हमको जची नहीं वो बात।

00:32:48.615 --> 00:32:50.714
मैं तो मौन रहा। (तो पूछा कि)
आपको कुछ कहना है?

00:32:50.738 --> 00:32:55.602
मैंने कहा,
'नहीं! मैं तो प्रश्न का उत्तर सुनता हूँ।
कोई मेरे को चर्चा करना नहीं (है)।'

00:32:55.626 --> 00:33:02.087
मुमुक्षु: दो द्रव्यों के बीच में डाल दिया।
पू. लालचंदभाई: हाँ! (उनका) एकत्व कर दिया,

00:33:02.111 --> 00:33:06.849
पराधीन कर दिया उपादान को;
स्वाधीन नहीं रखा। आहाहा!

00:33:06.873 --> 00:33:17.827
दूसरा प्रश्न ऐसा किया कि
जब अनादि मिथ्यादृष्टि जीव को
प्रथम उपशम सम्यग्दर्शन होता है, प्रथम...

00:33:17.851 --> 00:33:24.200
आपको नहीं अभ्यास है, क्या करें?
आहाहा! क्या करते हो आप?
व्यापार करते हो कि service (नौकरी)?

00:33:24.224 --> 00:33:26.511
मुमुक्षु: हम रेल चलाते हैं साहब!
ड्राइवर हैं।

00:33:26.535 --> 00:33:31.783
पू. लालचंदभाई: ड्राइवर हैं। रेल्वे?
रेल्वे का इंजन? इंजन चलाते हैं? अच्छा!

00:33:31.807 --> 00:33:36.929
हाँ! तो थोड़ा समय निकालकर इतना
स्वाध्याय करना चाहिए, सीखना चाहिए।

00:33:36.953 --> 00:33:42.080
अपने आत्मा का हित करने के
लिए थोड़ा एक ऐसा काम (के
लिए) समय निकालना चाहिए।

00:33:42.104 --> 00:33:47.020
समय मिलता है रुचि वालों को। रुचि
नहीं है आपको, रुचि हो तो समय मिले।

00:33:47.044 --> 00:33:50.038
मुमुक्षु: समय मिलता है
लेकिन समझ कम आता है।

00:33:50.062 --> 00:33:54.202
पू. लालचंदभाई: अच्छा!
नहीं! समझने का प्रयत्न नहीं करते हो।
समझने का प्रयत्न करो,

00:33:54.226 --> 00:33:57.910
आज थोड़ा समझे, कल ज्यादा समझोगे।
इसमें क्या है?

00:33:57.934 --> 00:34:00.968
समझ में आ जायेगा; नहीं आयेगा,
ऐसा नहीं है। आप आत्मा हैं।

00:34:00.992 --> 00:34:04.966
मुमुक्षु: आत्मा-आत्मा सुनता रहता (हूँ),
पढ़ने की भी कोशिश करता हूँ लेकिन
कुछ समझ नहीं आता है बराबर।

00:34:04.990 --> 00:34:10.707
पू. लालचंदभाई: ठीक है।
तो बात ऐसी है कि
दूसरा प्रश्न मैंने कहा, बहन जी!

00:34:10.731 --> 00:34:18.983
कि उपशम सम्यग्दर्शन होता है
अनादि मिथ्यादृष्टि जीव को, प्रथम, तो उसमें
निर्विकल्पध्यान में होता है कि सविकल्पदशा में?

00:34:19.007 --> 00:34:25.804
ऐसा मैंने प्रश्न किया?
तो उन्होंने कहा (कि)
भैया! मिश्र अवस्था है।

00:34:25.828 --> 00:34:29.822
चौकड़ा (cross लगा दिया मैंने);
शून्य नहीं, चौकड़ा (cross) हो गया।

00:34:29.846 --> 00:34:33.715
मुमुक्षु: क्योंकि उपशम सम्यक्त्व भी
निर्विकल्प अवस्था में (होता है)।

00:34:33.739 --> 00:34:37.794
उपशम सम्यग्दर्शन
निर्विकल्पदशा में होता है।
पू. लालचंदभाई: होता है। हाँ!

00:34:37.818 --> 00:34:43.954
आपने ऐसा जवाब दिया मगर
उन्होंने ऐसा जवाब नहीं दिया।

00:34:43.978 --> 00:34:48.433
गणेशप्रसाद वर्णीजी,
प्रसिद्ध व्यक्ति। आहाहा!

00:34:48.457 --> 00:34:51.837
समाज में किसी को पूछो
(तो कहे) प्रसिद्ध व्यक्ति,

00:34:51.861 --> 00:35:01.176
विद्वान, त्यागी, कषाय की मंदता,
सज्जनता, सरलता, बहुत गुणवाले,
ऐसे (वैसे) नहीं।

00:35:01.200 --> 00:35:10.109
हाँ! बाह्य का आचरण यथार्थ। तो भी तत्त्व
नहीं है तो आचरण (का) क्या करें बहन?

00:35:10.133 --> 00:35:19.147
वो तो स्वर्ग देगा, मोक्ष नहीं देगा।
सदाचरण स्वर्ग जरूर देगा यानि
स्वर्ग में जाकर दुखी होगा। क्या कहा?

00:35:19.171 --> 00:35:24.748
मुमुक्षु: स्वर्ग में जाकर दुखी होगा?
पू. लालचंदभाई: क्योंकि चारगति
दुखरूप हैं बहन। सुखरूप हैं?

00:35:24.772 --> 00:35:27.379
मुमुक्षु: नहीं!
अपने को जाने बिना दुख की...

00:35:27.403 --> 00:35:33.055
पू. लालचंदभाई: अपने को जाने बिना
दुख की निवृत्ति होती नहीं है।

00:35:33.079 --> 00:35:35.794
थोड़ा अभ्यास करो भैया।
भैया करो, करो!

00:35:35.818 --> 00:35:39.976
समझ में आ जायेगा, आ जायेगा।
आपके घर में हैं, पूछना उनको।

00:35:40.000 --> 00:35:43.336
थोड़ी देर गुरु बना लेना, थोड़ी देर।
समझ गए?

00:35:43.360 --> 00:35:48.178
धर्म पत्नी होने पर भी
जब स्वाध्याय में बैठो,
'मेरे को समझाओ’ ऐसा कहना;

00:35:48.202 --> 00:35:55.365
तो वो समझायेंगी थोड़ा-थोड़ा,
ख्याल है उनको तत्त्व का थोड़ा-थोड़ा।

00:35:55.389 --> 00:36:00.957
<b>प्रथम, श्रुतज्ञानके अवलम्बनसे
ज्ञानस्वभाव आत्माका निश्चय करके, </b>

00:36:00.981 --> 00:36:06.180
बाद में क्या करना? कि
<b>आत्माकी प्रगट प्रसिद्धिके लिये,</b>

00:36:06.204 --> 00:36:10.978
वो प्रगट प्रसिद्धि नहीं थी निर्णय में,
परोक्ष थी।

00:36:11.002 --> 00:36:17.009
निर्णय आया मगर अनुभव हुआ नहीं,
परोक्ष ज्ञान है, मानसिक ज्ञान है।

00:36:17.033 --> 00:36:20.772
और अतीन्द्रियज्ञान के द्वारा
आत्मा का अनुभव होता है।

00:36:20.796 --> 00:36:28.549
इंद्रियज्ञान ज्ञान नहीं है,
बहन जी, ज्ञेय है।
इंद्रियज्ञान ज्ञेय है, ज्ञान (नहीं है)।

00:36:28.573 --> 00:36:36.692
शास्त्रज्ञान ज्ञान नहीं है,
शास्त्रज्ञान ज्ञान नहीं है;
ज्ञेय है, बहन।

00:36:36.716 --> 00:36:40.772
आत्मा का ज्ञान,
वो ज्ञान है कि जो आत्मा को प्रसिद्ध करे।

00:36:40.796 --> 00:36:46.586
ऐसी बात बताते हैं कि
<b>आत्माकी प्रगट प्रसिद्धि</b>,
अभी अनुभूति की बात कहते हैं।

00:36:46.610 --> 00:36:52.827
<b>प्रगट प्रसिद्धिके लिए, </b>
अभी क्या करना आत्मा का
अनुभव करने के लिए? आहाहा!

00:36:52.851 --> 00:36:59.070
ये शुरुआत की बात है।
L.L.B. की बात नहीं है। हाँ!
मुमुक्षु: सर्वप्रथम!

00:36:59.094 --> 00:37:02.210
पू. ललचंदभाई: सर्वप्रथम,
प्रथम शब्द आपको बताया न?

00:37:02.234 --> 00:37:09.356
लिखा है इसमें, संस्कृत में भी है।
आप घर जाकर १४४ गाथा पढ़ लेना, १४४।

00:37:09.380 --> 00:37:16.585
मुमुक्षु: करते तो हैं अध्ययन पर
उतनी सूक्ष्मता में नहीं पहुँच पाये हैं।

00:37:16.609 --> 00:37:19.805
पू. लालचंदभाई: वो आत्मा का ज्ञान
सूक्ष्म क्यों नहीं होता है?

00:37:19.829 --> 00:37:27.811
उसके अंदर शल्य है (की) कुछ करना, 
कुछ करना, कुछ करना; जानना, जानना, जानना 
नहीं आता है; करना, करना, करना (आता है)।

00:37:27.835 --> 00:37:30.448
मैं जाननहार हूँ, जाननहार हूँ 
- ये नहीं आता है;

00:37:30.472 --> 00:37:36.976
मैं करनेवाला हूँ, ये करना, ये करना, 
ये करना, कुछ तो करना चाहिए न, कुछ तो 
करना चाहिए, किये बिना धर्म नहीं होता है।

00:37:37.000 --> 00:37:40.491
आत्मा का ज्ञान करने से धर्म 
होता है, वहाँ भी 'करना' आया।

00:37:40.515 --> 00:37:44.458
'करना' नहीं आया? 
आत्मा का ज्ञान 'करो'।

00:37:44.482 --> 00:37:48.213
जरूर आत्मा का ज्ञान करो, 
वो भी 'करना' है न, एक अपेक्षा से?

00:37:48.237 --> 00:37:57.913
कोई करना-करना पूछे (तो कहना) 
कि आत्मा का ज्ञान (और) आत्मा का 
श्रद्धान करना, बस, ऐसा करो न। आहाहा!

00:37:57.937 --> 00:38:02.937
<b>आत्माकी प्रगट प्रसिद्धिके लिये, 
पर पदार्थकी प्रसिद्धिकी कारणभूत</b>

00:38:02.961 --> 00:38:08.474
<b>जो इन्द्रियों द्वारा और मनके द्वारा 
प्रवर्तमान बुद्धियाँ उन सबको 
मर्यादामें लाकर</b> आहाहा!

00:38:08.498 --> 00:38:14.851
क्या फरमाते हैं? कि 
आत्मा का अनुभव करने के लिए 
जो पाँच इंद्रिय का फैलाव होता है

00:38:14.875 --> 00:38:22.006
इसको जानूँ, इसको स्पर्श करूँ, 
रस करूँ, सूँघूँ, ऐसे-ऐसे पाँच इंद्रिय 
तरफ, परज्ञेय तरफ (उपयोग) जाता है;

00:38:22.030 --> 00:38:24.757
<b>ज्ञेय से ज्ञेयान्तर </b>(अष्टपाहुड, 
शील पाहुड़ गाथा ३९), <b>ज्ञेय ज्ञेयान्तर</b> 
उपयोग जाता है,

00:38:24.781 --> 00:38:31.004
तो पाँच इंद्रिय और छठवाँ मन - 
उन दोनों को - पाँच और छठवें मन को,

00:38:31.028 --> 00:38:35.469
जो पर की प्रसिद्धि करता है, 
आत्मा को तिरोभूत करता है इंद्रियज्ञान,

00:38:35.493 --> 00:38:46.851
अभी उस इंद्रियज्ञान को समेटकर 
आत्मा के अभिमुख कर ले। 
आहाहा! ये process बताते हैं।

00:38:46.875 --> 00:38:49.119
<b>आत्माकी </b>...<b> पर 
पदार्थकी प्रसिद्धिकी कारणभूत </b>...

00:38:49.143 --> 00:38:54.802
<b>प्रवर्तमान बुद्धियाँ उन सबको 
मर्यादामें लाकर जिसने मतिज्ञान‑
तत्त्वको आत्मसन्मुख किया है </b>

00:38:54.826 --> 00:39:02.862
यानि मतिज्ञान है वो जो परसन्मुख था, 
वो 'मैं पर को जानता नहीं हूँ, 
मैं जाननहार को जानता हूँ’

00:39:02.886 --> 00:39:06.180
ऐसा विचार आया तो मतिज्ञान 
आत्माभिमुख हो गया।

00:39:06.204 --> 00:39:16.256
परसन्मुख था, 
वो आत्म-उन्मुख हो गया ऐसा।

00:39:16.280 --> 00:39:20.489
<b>जिसने मतिज्ञान‑तत्त्वको 
आत्मसन्मुख किया है ऐसा,</b>

00:39:20.513 --> 00:39:23.294
<b>तथा जो नाना प्रकारके 
नयपक्षोंके आलम्बनसे होनेवाले</b>

00:39:23.318 --> 00:39:28.856
<b>अनेक विकल्पोंके द्वारा आकुलता 
उत्पन्न करनेवाली श्रुतज्ञानकी 
बुद्धियोंको भी मर्यादामें लाकर</b>

00:39:28.880 --> 00:39:31.516
<b>श्रुतज्ञान‑तत्त्वको भी 
आत्मसन्मुख करता हुआ,</b>

00:39:31.540 --> 00:39:39.452
क्या कहा? कि नय के विकल्प में 
आया कि - राग से मैं भिन्न हूँ, 
मैं शुद्धात्मा हूँ, अभेद हूँ,

00:39:39.476 --> 00:39:45.044
टँकोत्कीर्ण एक ज्ञानानंद परमात्मा हूँ 
- ऐसा जो विकल्प उत्पन्न होता है

00:39:45.068 --> 00:39:51.519
श्रुतज्ञान के द्वारा, मन के संग से जो 
विकल्प उत्पन्न होता है, आत्मा का विचार!

00:39:51.543 --> 00:39:57.012
आत्मा का विचार दुखदायक है।

00:39:57.036 --> 00:40:02.801
आत्मा का जो विकल्प उठा न, 
उस विकल्प का फल तो दुख है। हें?

00:40:02.825 --> 00:40:07.185
मुमुक्षु: विकल्प दुखदायक है। 
पू. लालचंदभाई: दुखदायक है, 
विकल्पमात्र दुखदायक है।

00:40:07.209 --> 00:40:14.218
ऐसा जो विकल्प उठता था 
श्रुतज्ञान के द्वारा, मन के द्वारा, 
आत्मा का विचार उठता था,

00:40:14.242 --> 00:40:19.204
वो नय का विकल्प है, वो शुद्धनय 
का विकल्प है; शुद्धनय नहीं है।

00:40:19.228 --> 00:40:22.131
शुद्धनय का विकल्प, 
शुद्धात्मा का विकल्प।

00:40:22.155 --> 00:40:29.538
जैसा शुद्धात्मा है वैसा विचार करता है, 
वो भी विकल्प दुखदायक है - 
ऐसा लिखा है, दुखदायक है।

00:40:29.562 --> 00:40:41.809
आत्मा का विचार दुखदायक है 
तो वो पुण्य की क्रिया सुखदायक होगी? 
वो तो स्थूल है! आहाहा!

00:40:41.833 --> 00:40:48.183
पुण्य का भाव आता है मगर 
मैं उसका जाननेवाला हूँ, 
करनेवाला नहीं - इतना रखना बस।

00:40:48.207 --> 00:40:49.412
पुण्यभाव तो आता है।

00:40:49.436 --> 00:40:55.051
आर्यजीव को दया, दान, करुणा, 
कोमलता का भाव, देव-गुरु-शास्त्र 
की भक्ति का भाव आता है।

00:40:55.075 --> 00:40:59.666
आता है और बात; 
और मैं करनेवाला हूँ, और बात है।

00:40:59.690 --> 00:41:06.961
दो बात में आसमान - जमीन का फर्क है, 
पूर्व-पश्चिम का फर्क है, अँधकार 
और प्रकाश जितना फर्क है;

00:41:06.985 --> 00:41:11.878
एक जाननेवाला रहता है और 
एक करनेवाला बन जाता है। आहाहा!

00:41:11.902 --> 00:41:16.434
मुमुक्षु: करनेवाला महा-मिथ्यात्वी है। 
पू. लालचंदभाई: संसारी है 
- मैं करनेवाला हूँ;

00:41:16.458 --> 00:41:27.467
और दूसरा ज्ञानी होता है- आता है, मैं 
जानता हूँ, करनेवाला मैं नहीं हूँ, पर्याय 
का कर्ता पर्याय है, मैं करनेवाला नहीं हूँ।

00:41:27.491 --> 00:41:33.053
ऐसे<b> श्रुतज्ञान‑तत्त्वको भी 
आत्मसन्मुख करता हुआ, अत्यन्त 
विकल्परहित होकर, </b>अभी अनुभव हुआ।

00:41:33.077 --> 00:41:36.117
अनुभव की process बताई। 
<b>अत्यन्त विकल्प</b>,

00:41:36.141 --> 00:41:44.011
जो शुद्धात्मा का विकल्प आता था 
उसको भी छोड़ देता है। आत्माभिमुख 
हुआ तो वो विकल्प छूट जाता है।

00:41:44.035 --> 00:41:47.159
<b>तत्काल निज रससे ही </b>
चैतन्य रस से, आनंद रस से,

00:41:47.183 --> 00:41:50.778
 <b>प्रगट होनेवाले, 
आदि‑मध्य‑अन्तसे रहित, 
अनाकुल, केवल एक,</b>

00:41:50.802 --> 00:41:55.791
<b>सम्पूर्ण ही विश्व पर मानों 
तैरता हो ऐसे अखण्ड प्रतिभासमय, 
अनन्त, विज्ञानघन,</b>

00:41:55.815 --> 00:42:00.413
<b>परमात्मारूप समयसारका 
जब आत्मा अनुभव करता है</b> 
आहाहा!

00:42:00.437 --> 00:42:05.282
सब विकल्प छोड़कर अपना 
जो शुद्धात्मा नित्यानंद परमात्मा है,

00:42:05.306 --> 00:42:09.466
उसके अभिमुख उपयोग लाकर उसको 
जब, समयसार को अनुभव करता है,

00:42:09.490 --> 00:42:15.101
समयसार यानि शुद्धात्मा - जो भावकर्म, 
द्रव्यकर्म, नोकर्म से रहित ऐसा शुद्धात्मा,

00:42:15.125 --> 00:42:19.546
उसका जब आत्मा आत्माभिमुख होकर
अनुभव करता है,

00:42:19.570 --> 00:42:25.424
<b>उसीसमय </b>उस ही समय
<b> आत्मा सम्यक्तया दिखाई देता है </b>
आहाहा!

00:42:25.448 --> 00:42:31.101
उस समय आत्मा का अनुभव होता है 
तभी सम्यग्दर्शन होता है। आहाहा!

00:42:31.125 --> 00:42:34.461
<b>और ज्ञात होता है</b>, श्रद्धान में 
आता है और जानने में आता है।

00:42:34.485 --> 00:42:38.069
श्रद्धा में भी आया 
और जानने में भी वो आया।

00:42:38.093 --> 00:42:43.997
<b>इसलिये समयसार ही सम्यग्दर्शन 
और सम्यग्ज्ञान है। </b>आहाहा!

00:42:44.021 --> 00:42:48.997
आखिर में कहा कि जो शुद्धात्मा है 
वो ही सम्यग्दर्शन वो ही सम्यग्ज्ञान है।

00:42:49.021 --> 00:42:52.456
सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान से 
कोई शुद्धात्मा अलग नहीं है।

00:42:52.480 --> 00:43:01.005
शक्कर और शक्कर की मिठास, 
एक ही पदार्थ है, मिठास कहो कि शक्कर 
कहो एक ही बात है, अलग चीज नहीं है।

00:43:01.029 --> 00:43:07.753
आनंद आया, आनंद आया - अतींद्रिय आनंद; 
तो आनंद आया उसका नाम 
सम्यग्दर्शन-ज्ञान है, तो वो आत्मा ही है।

00:43:07.777 --> 00:43:13.755
आत्मा का परिणाम कहो कि आत्मा; 
अभेदनय से आत्मा है, 
भेदनय से द्रव्य और पर्याय है।

00:43:13.779 --> 00:43:21.456
तो अभेद का अनुभव होता है तब 
उसको सम्यग्दर्शन प्रगट हो जाता है।

00:43:21.480 --> 00:43:24.036
भावार्थ पण्डितजी ने लिखा है, 
जयचंद पण्डितजी ने।

00:43:24.060 --> 00:43:28.403
मुमुक्षु: ये शब्द आया 
<b>प्रगट प्रसिद्धि</b> ये उसके ऊपर जरा...

00:43:28.427 --> 00:43:32.405
पू. लालचंदभाई: <b>प्रगट प्रसिद्धि </b>
यानि पहले निर्णय किया।

00:43:32.429 --> 00:43:40.624
पहले आत्मा की प्रसिद्धि नहीं थी, 
प्रगट नहीं थी, परोक्ष थी। जैसा 
आत्मा था वैसा लक्ष में लिया था।

00:43:40.648 --> 00:43:44.442
मगर अभी प्रगट साक्षात् 
प्रत्यक्ष अनुभूति करने के लिए

00:43:44.466 --> 00:43:53.585
उसका जो ज्ञान (यानि) इंद्रियज्ञान 
बाहर जानने में जो जाता था, उसको 
रोक दिया, वैक्यूम-ब्रेक लगा दिया।

00:43:53.609 --> 00:43:57.744
जैसे विष्णुकुमार कभी-कभी 
वैक्यूम-ब्रेक लगाते हैं इंजन पर,

00:43:57.768 --> 00:44:00.634
कभी ऐसा accident (दुर्घटना) न होवे, 
तो जल्दी वैक्यूम-ब्रेक (लगाते हैं)।

00:44:00.658 --> 00:44:08.216
ऐसे मैं पर को जानता नहीं हूँ, 
मेरे ज्ञान में तो ये ज्ञायक जानने में आ रहा है।

00:44:08.240 --> 00:44:16.011
ऐसी पर की जो प्रसिद्धि थी, 
वो अपनी प्रगट प्रसिद्धि करने के 
लिए इंद्रियज्ञान को रोक देता है

00:44:16.035 --> 00:44:20.965
कि 'मैं पर को जानता नहीं हूँ, 
मैं तो जाननेवाले को जानता हूँ'।

00:44:20.989 --> 00:44:24.261
जाननेवाला मेरा आत्मा 
उसका मैं जाननहार हूँ।

00:44:24.285 --> 00:44:31.219
तो वहाँ से इंद्रियज्ञान फैला था 
बाहर, वो समेटा; समेटा समझे?

00:44:31.243 --> 00:44:35.842
समेट लिया और ज्ञान 
अभिमुख होता है आत्मा के।

00:44:35.866 --> 00:44:38.236
मेरे <b>उपयोग में</b> तो 
<b>उपयोग</b> है (समयसार गाथा १८१-१८३)।

00:44:38.260 --> 00:44:42.341
उपयोग में तो ज्ञायक है, 
उपयोग में राग नहीं है।

00:44:42.365 --> 00:44:49.666
जानन-क्रिया में जानन-आत्मा है 
- ऐसा विचार करते-करते-करते 
एक समय ऐसा आता है

00:44:49.690 --> 00:44:53.852
कि निर्विकल्पध्यान में आ जाता है, 
तो प्रगट प्रसिद्धि हो जाती है।

00:44:53.876 --> 00:44:56.373
इंद्रियज्ञान आत्मा को 
प्रसिद्ध नहीं करता था।

00:44:56.397 --> 00:45:04.697
अभी इंद्रियज्ञान रुक गया, अतीन्द्रियज्ञान 
नया प्रगट हुआ, वो नया प्रगट होता है, 
अज्ञानी के पास नहीं है (अतीन्द्रियज्ञान)।

00:45:04.721 --> 00:45:12.977
नया प्रगट होता है - श्रुतज्ञान, 
भावश्रुतज्ञान प्रगट होता है, उसके द्वारा 
आत्मा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।

00:45:13.001 --> 00:45:18.350
ये गृहस्थ अवस्था में होता है, 
इसके लिए दीक्षा लेने की जरूरत नहीं है।

00:45:18.374 --> 00:45:22.459
सम्यग्दर्शन के लिए नहीं है, 
चारित्र के लिए दीक्षा होती है।

00:45:22.483 --> 00:45:26.326
वो स्थिरता-लीनता के लिए 
वो दीक्षा होती है।

00:45:26.350 --> 00:45:32.139
बाकी सम्यग्दर्शन के लिए गृहस्थ अवस्था में, 
आपने प्रथमानुयोग पढ़ा होगा,

00:45:32.163 --> 00:45:37.225
प्रथमानुयोग में तो आता है कि वो 
सम्यग्दृष्टि होता है गृहस्थ अवस्था में।

00:45:37.249 --> 00:45:40.711
हो जाता है, 
उसमें कोई शंका नहीं है। समझे?

00:45:40.735 --> 00:45:48.475
तो गृहस्थ अवस्था में पहले सम्यग्दर्शन 
की प्रगटता का विचार करना। बस!

00:45:48.499 --> 00:45:56.766
<b>प्रगट प्रसिद्धि</b>, 
यानि परोक्ष प्रसिद्धि थी, अभी प्रगट हो गई। 
परोक्ष में (से) अभी प्रत्यक्ष होता है।

00:45:56.790 --> 00:46:01.066
मुमुक्षु: माने प्रत्यक्ष (मतलब) 
आत्मा के सन्मुख हो गया 
और परोक्ष इंद्रियों के (सन्मुख)?

00:46:01.090 --> 00:46:05.498
पू. लालचंदभाई: हाँ! 
परोक्ष तो इंद्रिय का धर्म है, 
आत्मा का धर्म नहीं है।

00:46:05.522 --> 00:46:11.341
आत्मा का ज्ञान नहीं है वो परोक्ष आत्मा; 
क्योंकि परोक्ष तो चला जाता है। 
इंद्रियज्ञान तो चला जाता है।

00:46:11.365 --> 00:46:15.899
अरिहंत भगवान, सिद्ध भगवान 
के पास कहाँ इंद्रियज्ञान है? 
बस! नहीं है, चला गया।

00:46:15.923 --> 00:46:18.512
तो अपनी श्रद्धा में से चला जाता है पहले।

00:46:18.536 --> 00:46:24.686
श्रद्धा में से चला जाता है 
कि मेरा स्वरूप वो नहीं है 
तो आत्मा का अनुभव होता है।

00:46:24.710 --> 00:46:35.111
बहन ने लिख दिया बहुत, अच्छी बात है। 
अध्ययन करना घर जाकर। 
Time (समय) हो गया।

00:46:35.135 --> 00:46:41.648
विष्णुकुमारजी, ये साथ में आयेगा, 
वो पैसा साथ में नहीं आयेगा आपके। 
आहाहा!

00:46:41.672 --> 00:46:47.296
मुमुक्षु: ये साथ में जायेगा? 
पू. लालचंदभाई: कौन?
मुमुक्षु: धर्म की बात।

00:46:47.320 --> 00:46:54.020
मुमुक्षु: धर्म साथ में जाएगा?
पू. लालचंदभाई: धर्म है न, 
आपका ज्ञान है न, आपके साथ जाएगा।

00:46:54.044 --> 00:47:08.791
ज्ञान आपके साथ जायेगा, 
बाकी कोई साथ में आपके आनेवाला नहीं है।

00:47:08.815 --> 00:47:34.935
मुमुक्षु: मंगलमय (३) रूप निहारा, 
मोहे परमानंद अपारा....

00:47:34.959 --> 00:48:07.464
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ मैं देखनहारा....

00:48:07.488 --> 00:48:23.103
आवे जो आवनहारा.... 
जावे जो जावनहारा.... १

00:48:23.127 --> 00:48:38.901
नहीं कुछ भी मुझे प्रयोजन, 
जानूँ मैं जाननहारा॥

00:48:38.925 --> 00:48:54.724
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ नित देखनहारा....

00:48:54.748 --> 00:49:10.121
उपजे जो उपजनहारा.... 
विनशे जो विनशनहारा.... २

00:49:10.145 --> 00:49:25.004
नहीं कोई प्रयोजन मुझको, 
जानूँ मैं जाननहारा॥

00:49:25.028 --> 00:49:40.476
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ प्रभु देखनहारा....

00:49:40.500 --> 00:50:11.587
बंधन मुक्ति न दिखाई, 
मैं मुक्त स्वरूप सदा ही.... ३

00:50:11.611 --> 00:50:26.265
ध्रुव एकरूप अविकारा.... 
जानूँ मैं जाननहारा।

00:50:26.289 --> 00:50:40.959
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ मैं देखनहारा....

00:50:40.983 --> 00:51:10.431
शाश्वत चेतन भगवाना, 
तिहूँ लोक में अनुपम जाना.... ४

00:51:10.455 --> 00:51:25.092
मैं ध्येयरूप सुखकारा.... 
जानूँ मैं जाननहारा।

00:51:25.116 --> 00:51:37.928
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ मैं देखनहारा....

00:51:37.952 --> 00:51:50.978
जहाँ शक्ति अनंत उछलती, 
प्रभुता शिवरूप विलसती.... ५

00:51:51.002 --> 00:52:05.973
बहे अखंड ज्ञानमय धारा, 
जानूँ मैं जाननहारा।

00:52:05.997 --> 00:52:33.428
मैं मग्न रहूँ निज में ही.... 
अक्षुण सुख हो निज में ही.... ६

00:52:33.452 --> 00:52:47.096
बस यही समय का सारा.... 
जानूँ मैं जाननहारा....

00:52:47.120 --> 00:53:00.545
जानूँ मैं जाननहारा.... 
बस यही समय का सारा।

00:53:00.569 --> 00:53:17.432
मंगलमयरूप निहारा मोहे, 
परमानंद अपारा....

00:53:17.456 --> 00:53:31.156
जानूँ मैं जाननहारा.... 
देखूँ मैं देखनहारा....